रविवार, 30 अगस्त 2020

धार्मिक भावनाओं को आहत करना गंभीर अपराध है ! जाने IPC की धारा 295 (A) के बारे में

  • धार्मिक भावनाओ को आहत करना =


तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए|  हमें भी इस धारा के बारे में गहन अध्ययन, और अपने लोगों तक इस अध्ययन को पहुंचाने और इसके बारे में जनसाधारण को जानकारी कराने की  इच्छा जागृत हुई| लगातार हो रही  ऐसी घटना  जिसमें धर्मों के खिलाफ बोलना लोगों का फैशन बन गया है| और यह वही लोग हैं |जो कभी धर्म की उन्नति के लिए या समाज की उन्नति के लिए कुछ कर नहीं सकते| और सदैव धर्म का नाम लेकर उल्टी-सीधी बकवास करते हुए दिखाई पड़ जाते हैं| जनसाधारण को यह जान लेना बहुत आवश्यक है| की धार्मिक भावनाओं को आहत करना कानून अपराध है | जिसकी व्याख्या भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 295 (A) में की किया गया  है| और कई ऐसे माननीय उच्च न्यायालय और माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश हैं| जिसके माध्यम से इन धाराओं को वैध करार दिया गया है| और ऐसे कृत्या को अपराध की श्रेणी  में रक्खा गया है |

  • आइए सबसे पहले जानते हैं कि क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 295 (A)-


भारतीय दंड संहिता 1860  की धारा 295(A)  के अंतर्गत वह कृत्य अपराध माने जाते हैं| जहां कोई आरोपी व्यक्ति भारत के नागरिकों के किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के विचार से ,और विद्वेषपूर्ण  आशा से उस वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करता है| या ऐसा करने का प्रयत्न करता है |तो  वह इस धारा के अंतर्गत दंडनीय होगा |

दूसरे शब्दों में अगर कहा जाए तो |


धारा 295 (A)  कहती है , कि विमर्शित और विद्वेष पूर्ण कार्य जो किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करने  | उसकी धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आशय से किए गए हो | जो कोई भारत के नागरिकों के किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के विमर्शित  और विद्वेषपूर्ण आशय  से उस वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान उच्चारित ,या लिखित शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्य रूपों द्वारा या अन्यथा करेगा|
 या करने का प्रयत्न करेगा | वह दोनों में से किसी भांति के कारावास जिसकी अवधि 3 वर्ष तक की हो सकेगी | 
या जुर्माने से या दोनों से दंडित किया जाएगा |

  • इस धारा पर उठ चुके है सवाल-


भारतीय दंड संहिता 1960 की धारा 295 (A) की संवैधानिकता पर सवाल भी खड़े किए जा चुके हैं |
बता दूँ 
 रामजीलाल मोदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य ए आई आर 1957 एस सी 620 के मामले में लगा था |
और उच्चतम न्यायालय द्वारा यहां आदेशित  किया गया था | कि यह धारा संविधान के विरुद्ध नहीं है |
दरअसल इस मामले में याचिकाकर्ता एक मासिक पत्रिका "गौ रक्षक" का संपादक /प्रकाशक था| 
जिसे भारतीय दंड संहिता 1860  की धारा 295 (A) के तहत अपनी पत्रिका में छपे एक लेख के चलते अदालत द्वारा दोषी ठहराया गया था | 
दोष  सिद्धि के बाद उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपील की इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सेशन न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा |
इसके बाद याचिकाकर्ता उच्चतम न्यायालय पहुंचा | उसकी यह दलील थी | कि यह धारा संविधान के अनुच्छेद 19(1)A   के अंतर्गत गारंटी किए गए मूल अधिकार 'वाक  स्वातन्त्र्य'  के खिलाफ है | अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा था |
 कि यह धारा केवल धर्म के अपमान के गंभीर रूप को दण्डित  करती है | जब वह अपमान किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के  और विद्वेषपूर्ण   किया जाता है | 
अपमान के इस उग्र रूप की प्रविष्टि स्पष्ट रूप से लोक व्यवस्था को बाधित करना होती है | 
और यह धारा इस तरह की गतिविधियों को दंडित करती है | 
इसलिए इस धारा को संविधान के अनुच्छेद 19 (2 ) का संरक्षण अच्छी तरह से प्राप्त है | जो कि अनुच्छेद 19 (1)(A ) द्वारा गारंटी कृत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के अभ्यास पर उचित प्रतिबंध लगाने वाले कानून को संरक्षण देता है |

मतलब मित्रों 

माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी इस धारा को सही ठहराते हुए इस धारा को वैध माना था जिसको संविधान का भी बल प्राप्त है

मित्रों लगातार देखा जा रहा है | कि धर्म के खिलाफ बोलना लोगों का फितूर बनता जा रहा है | और उनको दो अक्षर पढ़ने के बाद ऐसा लगता है |जैसे पूरा ब्रह्मांड उन्हीं के ज्ञान  में समाहित हो गया है | और आपके सामने ऐसे ऐसे तर्क प्रस्तुत करते हैं | लोग जिसका कोई सिर पैर नहीं होता | ऐसे लोगों को भी यह जान लेना चाहिए | कि किसी भी धर्म का अपमान करना ना केवल सामाजिक अपितु कानून भी अपराध की श्रेणी में आता है |और जनसाधारण को भी इस धारा के बारे में जानकारी होनी आवश्यक है | जिससे किसी भी धर्म का किसी भी अराजक तत्वों द्वारा अपमान ना किया जा सके | जबकि संवैधानिक संरक्षण धर्म के सम्मान के लिए प्राप्त है
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