मंगलवार, 1 सितंबर 2020

न्यायालय की अवमानना के दोषी सिद्ध हुए प्रशान्त भूषण हुवा एक रुपया का जुर्माना | जाने क्या है न्यायालय की अवमानना ? आपको भी ध्यान रखना होगा क्योकि न्यायालय की अवमानना आपसे भी अनजाने में हो सकती है

न्यायालय की अवमानना के दोषी शिद्ध हुए प्रशान्त भूषण हुवा एक रुपया का जुर्माना 

तो समझिये क्या होती है न्यायालय की अवमानना 

न्यायालय की अवमानना:

  • न्यायालय का अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Court Act, 1971) के अनुसार, न्यायालय की अवमानना का अर्थ किसी न्यायालय की गरिमा तथा उसके अधिकारों के प्रति अनादर प्रदर्शित करना है।
  • इस अधिनियम में अवमानना को ‘सिविल’ और ‘आपराधिक’ अवमानना में बाँटा गया है।
    • सिविल अवमानना: न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री, आदेश, रिट, अथवा अन्य किसी प्रक्रिया की जान बूझकर की गई अवज्ञा या उल्लंघन करना न्यायालय की सिविल अवमानना कहलाता है।
    • आपराधिक अवमानना: न्यायालय की आपराधिक अवमानना का अर्थ न्यायालय से जुड़ी किसी ऐसी बात के प्रकाशन से है, जो लिखित, मौखिक, चिह्नित , चित्रित या किसी अन्य तरीके से न्यायालय की अवमानना करती हो।
  • हालाँकि किसी मामले का निर्दोष प्रकाशन, न्यायिक कृत्यों की निष्पक्ष और उचित आलोचना तथा न्यायालय के प्रशासनिक पक्ष पर टिप्पणी करना न्यायालय की अवमानना के अंतर्गत नहीं आता है।

न्यायालय की अवमानना के लिये दंड का प्रावधान:

  • सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय को अदालत की अवमानना के लिये दंडित करने की शक्ति प्राप्त है। यह दंड छह महीने का साधारण कारावास या 2000 रूपए तक का जुर्माना या दोंनों एक साथ हो सकता है।
  • वर्ष 1991 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला सुनाया कि उसके पास न केवल खुद की बल्कि पूरे देश में उच्च न्यायालयों, अधीनस्थ न्यायालयों तथा न्यायाधिकरणों की अवमानना के मामले में भी दंडित करने की शक्ति है।
  • उच्च न्यायालयों को न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 10 के अंतर्गत अधीनस्थ न्यायालयों की अवमानना के लिये दंडित करने का विशेष अधिकार प्रदान किया गया है।

अवमानना अधिनियम की आवश्यकता:

  • न्यायालय का अवमानना अधिनियम, 1971 का उद्देश्य न्यायालय की गरिमा और महत्त्व को बनाए रखना है।
  • अवमानना से जुड़ी हुई शक्तियाँ न्यायाधीशों को भय, पक्षपात और की भावना के बिना कर्त्तव्यों का निर्वहन करने में सहायता करती हैं।

संवैधानिक पृष्ठभूमि:

  • अनुच्छेद 129: सर्वोच्च न्यायालय को स्वंय की अवमानना के लिये दंडित करने की शक्ति देता है।
  • अनुच्छेद 142 (2): यह अनुच्छेद अवमानना के आरोप में किसी भी व्यक्ति की जाँच तथा उसे दंडित करने के लिये सर्वोच्च न्यायालय को सक्षम बनाता है।
  • अनुच्छेद 215: उच्च न्यायालयों को स्वंय की अवमानना के लिये दंडित करने में सक्षम बनाता है
आपको भी ध्यान रखना होगा क्योकि न्यायालय की अवमानना आपसे भी अनजाने में हो सकती है | 
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रविवार, 30 अगस्त 2020

धार्मिक भावनाओं को आहत करना गंभीर अपराध है ! जाने IPC की धारा 295 (A) के बारे में

  • धार्मिक भावनाओ को आहत करना =


तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए|  हमें भी इस धारा के बारे में गहन अध्ययन, और अपने लोगों तक इस अध्ययन को पहुंचाने और इसके बारे में जनसाधारण को जानकारी कराने की  इच्छा जागृत हुई| लगातार हो रही  ऐसी घटना  जिसमें धर्मों के खिलाफ बोलना लोगों का फैशन बन गया है| और यह वही लोग हैं |जो कभी धर्म की उन्नति के लिए या समाज की उन्नति के लिए कुछ कर नहीं सकते| और सदैव धर्म का नाम लेकर उल्टी-सीधी बकवास करते हुए दिखाई पड़ जाते हैं| जनसाधारण को यह जान लेना बहुत आवश्यक है| की धार्मिक भावनाओं को आहत करना कानून अपराध है | जिसकी व्याख्या भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 295 (A) में की किया गया  है| और कई ऐसे माननीय उच्च न्यायालय और माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश हैं| जिसके माध्यम से इन धाराओं को वैध करार दिया गया है| और ऐसे कृत्या को अपराध की श्रेणी  में रक्खा गया है |

  • आइए सबसे पहले जानते हैं कि क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 295 (A)-


भारतीय दंड संहिता 1860  की धारा 295(A)  के अंतर्गत वह कृत्य अपराध माने जाते हैं| जहां कोई आरोपी व्यक्ति भारत के नागरिकों के किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के विचार से ,और विद्वेषपूर्ण  आशा से उस वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करता है| या ऐसा करने का प्रयत्न करता है |तो  वह इस धारा के अंतर्गत दंडनीय होगा |

दूसरे शब्दों में अगर कहा जाए तो |


धारा 295 (A)  कहती है , कि विमर्शित और विद्वेष पूर्ण कार्य जो किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करने  | उसकी धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आशय से किए गए हो | जो कोई भारत के नागरिकों के किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के विमर्शित  और विद्वेषपूर्ण आशय  से उस वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान उच्चारित ,या लिखित शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्य रूपों द्वारा या अन्यथा करेगा|
 या करने का प्रयत्न करेगा | वह दोनों में से किसी भांति के कारावास जिसकी अवधि 3 वर्ष तक की हो सकेगी | 
या जुर्माने से या दोनों से दंडित किया जाएगा |

  • इस धारा पर उठ चुके है सवाल-


भारतीय दंड संहिता 1960 की धारा 295 (A) की संवैधानिकता पर सवाल भी खड़े किए जा चुके हैं |
बता दूँ 
 रामजीलाल मोदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य ए आई आर 1957 एस सी 620 के मामले में लगा था |
और उच्चतम न्यायालय द्वारा यहां आदेशित  किया गया था | कि यह धारा संविधान के विरुद्ध नहीं है |
दरअसल इस मामले में याचिकाकर्ता एक मासिक पत्रिका "गौ रक्षक" का संपादक /प्रकाशक था| 
जिसे भारतीय दंड संहिता 1860  की धारा 295 (A) के तहत अपनी पत्रिका में छपे एक लेख के चलते अदालत द्वारा दोषी ठहराया गया था | 
दोष  सिद्धि के बाद उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपील की इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सेशन न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा |
इसके बाद याचिकाकर्ता उच्चतम न्यायालय पहुंचा | उसकी यह दलील थी | कि यह धारा संविधान के अनुच्छेद 19(1)A   के अंतर्गत गारंटी किए गए मूल अधिकार 'वाक  स्वातन्त्र्य'  के खिलाफ है | अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा था |
 कि यह धारा केवल धर्म के अपमान के गंभीर रूप को दण्डित  करती है | जब वह अपमान किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के  और विद्वेषपूर्ण   किया जाता है | 
अपमान के इस उग्र रूप की प्रविष्टि स्पष्ट रूप से लोक व्यवस्था को बाधित करना होती है | 
और यह धारा इस तरह की गतिविधियों को दंडित करती है | 
इसलिए इस धारा को संविधान के अनुच्छेद 19 (2 ) का संरक्षण अच्छी तरह से प्राप्त है | जो कि अनुच्छेद 19 (1)(A ) द्वारा गारंटी कृत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के अभ्यास पर उचित प्रतिबंध लगाने वाले कानून को संरक्षण देता है |

मतलब मित्रों 

माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी इस धारा को सही ठहराते हुए इस धारा को वैध माना था जिसको संविधान का भी बल प्राप्त है

मित्रों लगातार देखा जा रहा है | कि धर्म के खिलाफ बोलना लोगों का फितूर बनता जा रहा है | और उनको दो अक्षर पढ़ने के बाद ऐसा लगता है |जैसे पूरा ब्रह्मांड उन्हीं के ज्ञान  में समाहित हो गया है | और आपके सामने ऐसे ऐसे तर्क प्रस्तुत करते हैं | लोग जिसका कोई सिर पैर नहीं होता | ऐसे लोगों को भी यह जान लेना चाहिए | कि किसी भी धर्म का अपमान करना ना केवल सामाजिक अपितु कानून भी अपराध की श्रेणी में आता है |और जनसाधारण को भी इस धारा के बारे में जानकारी होनी आवश्यक है | जिससे किसी भी धर्म का किसी भी अराजक तत्वों द्वारा अपमान ना किया जा सके | जबकि संवैधानिक संरक्षण धर्म के सम्मान के लिए प्राप्त है
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शनिवार, 29 अगस्त 2020

IPC की धारा 4, धारा 5

 

  • IPC धारा  4- 

राज्य क्षेत्रातीत अपराधों पर संहिता का विस्तार-

1- भारत से बाहर और किसी स्थान में भारत के किसी नागरिक द्वारा|

2- भारत में रजिस्ट्री कृत किसी पोतिया विमान पर चाहे वह कहीं भी हो किसी व्यक्ति द्वारा किए गए किसी अपराध को भी लागू है|

3- कोई व्यक्ति किसी अस्थान में भारत से बाहर और पड़े कोई अपराध भारत में स्थित कंप्यूटर साधन को लक्ष्य बनाते हुए कार्य करता है|

आइए विस्तार से अपनी भाषा में समझते हैं|-

 शब्द अपराध संहिता  में ऐसा प्रत्येक अपराध सम्मिलित है| जो भारत से बाहर किया गया है | जो यदि भारत में किया जाता है | तो इस संहिता  के अंतर्गत दंडनीय होता है | तो ऐसे अपराधों को बाहर करने पर भी संहिता  सामान प्रावधान प्रदान करती है|

इसको उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं|

 का जो भारत का नागरिक है चीन में हत्या करता है अगर  वाह भारत के किसी स्थान पर पाया जाए तो जहां वह पाया जाए वहां हत्या के लिए विचारित और दोष सिद्ध किया जा सकता है|

  • IPC धारा . 5
-इस अधिनियम में कोईबात भारत सरकार की सेना के अफसरों, सैनिकों, को नौसैनिकों या वायु सैनिकों द्वारा विद्रोह और  अभित्यजन जन को दंडित करने वाले किसी अधिनियम के उपबंध हो या किसी विशेष या स्थानीय विधि के उपबंधों, पर प्रभाव नहीं डालेगी



क्रास केस क्या है ? क्रास केस की शिकायत कैसे करें? अगर पुलिस क्रास केस न करें तो कोर्ट द्वारा कैसे किया जाए?

  • क्रॉस केस क्या है?-- 
जब दो पक्ष एक दूसरे पर एफ आई आर रजिस्टर्ड करवाते हैं| ऐसे केसों को क्रास केस कहा जाता है| 
विस्तार से समझने के लिए अगर अमित ने एक एफ आई आर सोहन के खिलाफ दर्ज करवाई है| और बाद में सोहन उसी प्रकरण का f.i.r. अमित के खिलाफ दर्ज करा दे तो ऐसे मामलों को क्रास केस कहा जाता है|

  • क्रास केस की शिकायत कैसे करें  ? 

पुलिस थाने के अंदर आपके एप्लीकेशन पर ही क्रास केस दर्ज कर दे तो अच्छा है| नहीं तो पुलिस ज्यादातर मामलों में टालमटोल कर देती है| ऐसे में हमें यह जानकारी होना बहुत जरूरी है| कि आगे के क्या  रास्ते होते हैं |तो आइए जानते हैं| सबसे पहले हमें अगर संभव हो तो 112 नंबर पर कॉल करनी चाहिए| और उसके बाद इंस्पेक्टर से ऊपर किसी भी अधिकारी के पास शिकायत दर्ज करानी चाहिए  अगर इंस्वपेक्हांटर नहीं सुन रहा तो | शिकायत ऑनलाइन ऑफलाइन हो सकती है |और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है की  हमें  अपना मेडिकल करवा लेना चाहिए ताकि भविष्य में अगर जरूरत पड़े तो कोर्ट से क्रास केस  कराया जा सके|

मित्रों मेडिकल की बात करें तो यह एक महत्वपूर्ण कड़ी है |इस लिए इस्पे विशेष बात करते हैं | अगर पुलिस आपका मेडिकल नहीं करा रही है| तो आप पुलिस के सीनियर ऑफिसर से शिकायत करके अपना मेडिकल करवा सकते हैं| अगर सीनियर ऑफिसर भी आपकी बात नहीं सुनते हैं| और अगले पक्ष का मेडिकल करवा लिया जाता है| और आपका   मेडिकल नहीं कराया जाता है | तो आप अपना प्राइवेट मेडिकल करवा सकते हैं|

मेडिकल कराना मित्रों बहुत जरूरी है क्योंकि कोट सबूतों के आधार पर ही सजा सुनाती है तो अगर आप को गंभीर चोटें नाभि आई हो तब भी आप अपना  मेडिकल करवा सकते हैं| अगर आपका स्कीन लाल भी हो या सुजन हो तब भी आपका मेडिकल हो सकता है |
  • अगर पोलिष क्रास केस न करें तो  कोर्ट द्वारा  क्रास केस कैसे किया जाए ?

अगर आपकी पुलिस नहीं सुने, और सीनियर अधिकारी भी आपकी बात नहीं सुन रहे हैं| तो आप कोर्ट में जाकर धारा 156 (3) सीआरपीसी के तहत  कोर्ट के माध्यम से केस दर्ज करा सकते हैं |अगर आप शिकायत में अपनी बात कहते हैं और मेडिकल रिपोर्ट भी लगाते हैं |तो अगर कोर्ट को लगे कि आपकी बात और तथ्यों में सच्चाई है |तो वह संबंधित पुलिस थाने को एफ आई आर दर्ज करने का आदेश दे सकती है|

  • क्रास केस करने की समय सीमा क्या है ?-

वैसे तो क्रिमिनल केस करने की कोई समय सीमा नहीं होती है| लेकिन फिर भी जब सामने वाले की ऍफ़  आई आर दर्ज हो गई हो| तो बिना देरी किए अपनी एफ आई आर दर्ज करा लेनी चाहिए| 
और इस तथ्य को नहीं भूलना चाहिए की देरी  करना नुकसानदेह होता है|

शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

IPC की धारा 1 , धारा 2, धारा 3,

IPC की धारा 

आईपीसी के बारे में बात करते हुए | आज आईपीसी की प्रथम धारा का वर्णन करना आवश्यक हो गया है |जो अनावश्यक ही छुट  जाती है| और ना ही हम कभी इन छोटी धाराओं का जिक्र ही करते हैं | लेकिन अगर सोचा जाए| तो इस ग्रंथ रूपी किताब की यह छोटी धाराएं आधारशिला हैं जो | मुख्य रूप से इस संहिता की  अवधारणा को व्यक्त करती है | इनको समझना सभी के लिए आवश्यक है | परन्तु   हम उन सभी धाराओं को समझ लेते हैं| जो हमारे समाज में दंडात्मक  और  गंभीर मानी जाती है| और हम इन आधारभूत धाराओं को विस्मृत कर देते हैं| जबकि इन सभी धाराओं क  ज्ञान ही हमें  पूर्ण बनाता है | तो फिर आइए अब क्रमशः  इन धाराओं की चर्चा कर लेते हैं |

आईपीसी की प्रथम धारा से इस ग्रंथ की शुरुआत होती है |जो इस प्रकार है| 


  •  IPC की धारा .1-
 यह अधिनियम भारतीय दंड संहिता कहलाएगा |और इसका विस्तार संपूर्ण भारत में होगा|
 बता दूं कि धारा 370 हटने के बाद आईपीसी की सभी धाराएं जम्मू कश्मीर राज्य में भी लागू होने लगी हैं|
अतः इस धारा में  संहिता  का नाम और   प्रवर्तन के विस्तार बताए गए हैं|

  • IPC  धारा . 2-
ब्यक्तिक क्षेत्राधिकार- जहां किसी व्यक्ति द्वारा भारतीय सीमा के अंदर कोई अपराध किया जाता है| चाहे वह भारतीय नागरिक हो या विदेशी संहिता  वहां पर लागू होगी | क्योंकि जो व्यक्ति अपराध कारित  करता है| वह अपराध के प्रभाव को भारत की धरती पर उत्पन्न करता है | संहिता की धारा २  ऐसे मामलों से ही संबंधित है|
 हम कह सकते हैं कि व्यक्ति भारत के अंदर अपराध कार्य करेगा| चाहे वह किसी भी प्रांत का किसी भी देश का हो उसके ऊपर आईपीसी की धारा प्रभावी होगी|

  • IPC धारा .3- 

संहिता की धारा 3  बहू प्रदेशिक क्षेत्राधिकार से संबंधित है| भारतीय आपराधिक न्यायालय का क्षेत्राधिकार इसके नागरिकों पर भारत के भीतर तथा इसके बाहर भी है| साधारण रूप में किसी देश के न्यायालय को केवल अंतः प्रादेशिक क्षेत्राधिकार होता है| तथा इसकी विधियां उसकी सीमा के भीतर ही प्रवर्तित हो सकती हैं| क्योंकि कोई अपनी सीमा से दूसरे राज्य को अपना अधिकार लागू करने की सहमति नहीं दे सकता | परंतु अपवाद परिस्थितियों में वही प्रदेशिक प्रभाव रखने वाली विधियों को अधिनियमित किया जाता है |भारतीय संविधान के अनुच्छेद  245(2) निर्धारित करती है, कि संसद द्वारा निर्मित कोई भी कानून वही प्रदेश क्षेत्र अधिकार होने के कारण अवैधानिक नहीं समझा जाएगा| यह अनुच्छेद निर्धारित करता है ,कि यदि कोई कृत्य भारत में अपराध है और वही कृत्य भारत की सीमा से परे यदि घटित होता है | तो भी वह अपराध होगा|  धारा 3 में प्रयुक्त भारतीय विधि द्वारा शब्द का प्रयोग | इस धारा के प्रवर्तन को प्रत्यर्पण अधिनियम 1962 ,तथा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 187  और 188 में वर्णित मामलों तक ही सीमित रखता है| अपराध किसी भी व्यक्ति ,जो आरोपित अपराध को करते समय भारतीय न्यायालयों के क्षेत्राधिकार में था |  द्वारा किया  जा सकता है| ऐसा व्यक्ति भारतीय नागरिक हो भी सकता है| और नहीं भी यदि कोई भारती किसी दूसरे देश में एक कार्य करता है |और वह कार्य उस देश की विधि के अनुसार अपराध नहीं है| किंतु भारतीय विधि के अनुसार अपराध है| तो उसे भारत में अभियोजन(मुकदमा) का सामना करना पड़ेगा|

आइए इसको उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं-

रवि एक भारतीय लड़का है उसने एक विदेशी  डेविड को कुछ काम करने के लिए ₹10000 का चेक प्रदान किया  है| डेविड रवि को धोखा देकर अपने देश चला जाता है| तो रवि इस मामले को न्यायालय में अभियोजन कर सकता है चाहे वह व्यक्ति भारत में या भारत के परे का व्यक्ति ह


गुरुवार, 27 अगस्त 2020

भारतीय संविधान की विशेषताएं

भारतीय संविधान की विशेषताएं 

मित्रों हमारे भारतीय संविधान की विशेषताओं के वजह से ही भारतीय संविधान दुनिया में अपनी एक नई पहचान और यह कह सकते हैं कि अपनी एक अलग पहचान बनाने में कामयाब हुआ है  भारतीय संविधान एक ऐसा संविधान है| जो विश्व में सबसे बड़ा संविधान कहा जाता है तो आइए हम और आप क्रमबद्ध देखते हैं  कि भारतीय संविधान की क्या खूबियाँ ( विशेषताएं) हैं|

  • - लिखित एवं  विस्तृत संविधान-

 
1-भारतीय संविधान संविधान सभा के द्वारा  निर्माण किया हुआ एवं लिखित संविधान है   इस नजरिए से भारतीय संविधान अमेरिकी संविधान के समतुल्य है|
 
2- मूल संविधान में एक प्रस्तावना, 395 अनुच्छेद ,22 भाग और 18 अनुसूचियां थी  वर्तमान में इनमें एक प्रस्तावना 465 अनुच्छेद, 25 भाग और 12 अनुसूचियां हैं|

3-जैसा कि  हम ऊपर बता चुके हैं  कि भारतीय संविधान विश्व का सबसे विस्तृत संविधान है |

  • संविधान की प्रस्तावना --

 भारतीय संविधान का प्रारंभ एक प्रभावशाली प्रस्तावना से होता है  जिसमें जनता की भावनाएं और आकांक्षाएं छोटे रूप में समाविष्ट हैं संविधान की प्रस्तावना संविधान निर्माताओं के विचारों का व्याख्यान भी करती है |

  • सम्प्रभुता सम्पन्न राज्य -- 

1 -संप्रभुता संपन्न राज्य उसे कहते हैं  जो बाहरी  नियंत्रण से सर्वथा मुक्त हो  और अपनी आंतरिक तथा बैदेशिक नीतियों को स्वयं निर्धारित करता हो  इस मामले में भारत पूर्णतः स्वतन्त्र है ।

2-भारत की संप्रभुता किसी विदेशी सत्ता में नही बल्कि भारत की जनता में ही निहित है| 
मित्रों  बता दूं कि भारत आज भी राष्ट्रमंडल (commonwealth)और संयुक्त राष्ट्र संघ (U.N.O) का एक सदस्य है ,लेकिन यह सदस्यता भारत की अपनी इच्छा से है |

  •  लोकतंत्रात्मक गणराज्य-


 1-भारत में प्रतिनिधि मूलक प्रजातंत्र की स्थापना की गई है अर्थात भारत का शासन भारतीय जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि ही संचालित करते हैं

2--गणराज्य(Republic)-गणराज्य से आशय है  कि राज्य के सभी नागरिकों को अपनी योग्यता अनुसार सभी छोटे, बड़े पदों पर पहुंचने का अधिकार हो| एवं साथ ही भारतीय गणराज्य का प्रमुख( राष्ट्रपति) एक निर्वाचित व्यक्ति हो| ना कि ब्रिटेन की तरह अनुवांशिक व्यक्ति|

  • संसदीय सरकार-


1- संविधान में  संसदीय प्रणाली के शासन का प्रावधान ह| इस प्रणाली में वास्तविक कार्यपालिका शक्ति जनता के निर्वाचन प्रतिनिधियों में नहीं होती है| मंत्रिपरिषद का प्रमुख प्रधानमंत्री होता है यह  सामूहिक रूप से  संसद के प्रति उत्तरदाई होती है  |

2- संविधान के अनुसार समस्त कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति के हाथों में निहित है  किंतु राष्ट्रपति इस शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह पर करते हैं अर्थात मित्रों कर सकते हैं की भारतीय राष्ट्रपति के हाथ बने हुए होते हैं|

  •  मूल अधिकार- 

1-अमेरिकी संविधान से प्रेरणा लेकर भारतीय संविधान के भाग 3 में नागरिकों को मूल अधिकार  प्रदान किए गए हैं| मित्रों हम कह सकते हैं कि मूल अधिकार संविधान की एक मुख्य विशेषता है|

  • राज्य के नीति निदेशक तत्व-

1- आयरलैंड के संविधान से प्रेरणा लेकर भारतीय संविधान के भाग 4 में कुछ ऐसे निदेशक तत्वों का उल्लेख किया गया है जिसका पालन करना राज्य का कर्तव्य है |निदेशक तत्वों के माध्यम से देश में कल्याणकारी राज्य की स्थापना का प्रावधान किया गया है|

नोट => ग्रेनविल आँस्टीन के अनुसार  नीति निर्देशक तत्व और अधिकार संविधान की आत्मा है मित्रों

  • एकीकृत एवं स्वतंत्र न्यायपालिका-

1-- भारत का संविधान एकीकृत एवं स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना करता है भारतीय न्यायपालिका में शीर्ष स्तर पर सर्वोच्च न्यायालय है  राज्य में उच्च न्यायालय एवं नीचे क्रमशा अधीनस्थ न्यायालय हैं|

2- सर्वोच्च न्यायालय संघीय अदालत है जो संविधान एवं मौलिक अधिकारों की संरक्षक है इसलिए संविधान में 
न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं|

3- न्यायपालिका को स्वतंत्र रखने के लिए जजों की नियुक्ति  वेतन, भत्ता तथा पद से हटाने के संबंध में संविधान में ही स्पष्ट प्रावधान कर दिए गए हैं जिससे मित्रों कोई भी सरकार न्यायाधीशों पर दबाव ना बना सके|

  • संसदीय सर्वोच्चता और न्यायिक सर्वोच्चता का समन्वय-

भारतीय संविधान में संसदीय सर्वोच्चता और न्यायपालिका की सर्वोच्चता के बीच एक अद्भुत समन्वय है
 यानी कि भारतीय संसद इंग्लैंड की संसद की तरह सर्वोच्च नहीं है और ना ही अमेरिका की न्यायपालिका की तरह भारतीय न्यायपालिका को असीमित शक्तियां प्राप्त हैं यही भारतीय संविधान की खूबसूरती और जटिलता भी हैमित्रों|

  • कठोर एवं लचीला संविधान-

 आप सोच रहे होंगे कठोर भी और लचीला भी आइए देखते हैं कैसे-
1-यह कठोर इसलिए है कि इसके कुछ प्रावधानों में संशोधन करना अत्यंत कठिन है |और इसके लिए विशेष प्रक्रिया का अनुसरण किया जाता है जबकि अधिकांश प्रावधानों को संसद द्वारा बहुमत से संशोधित किया जाता है| जो कि संविधान के लचीलापन को दर्शाता है|

2-- हमारे संविधान में कुछ ऐसे संशोधन हुए हैं| मित्रों जिसके फलस्वरूप तात्विक  दृष्टि से संविधान की दोबारा रचना हो गई है | इनमें विशेष उल्लेखनीय हैं जैसे 7 वं,42 वा ,73वां और 74 व  संविधान संशोधन तथा अंतिम 2 संशोधनों में क्रमशः भाग 9 और 9(क) जोड़े गए जो पंचायत और न्यायपालिका से संबंधित है | इस प्रकार एक तीसरे स्तर के शासन के बारे में उपबन्ध  किया गया जो किसी अन्य देश के किसी संविधान में नहीं मिलता है| 

  • एकल नागरिकता -

1- संघात्मक संविधान में साधारण रूप से दोहरी नागरिकता होती है| जैसे अमेरिकी संविधान में दोहरी नागरिकता का प्रावधान है लेकिन भारतीय संविधान केवल एक नागरिकता को मान्यता प्रदान करता है जैसा कि आप सभी लोग जानते हैं| कि भारत का किसी भी राज्य के  व्यक्ति को भारत की ही नागरिकता प्राप्त  होती है | अलग-अलग राज्यों की नागरिकता प्रदान नहीं की जाती है| इससे देश की अखंडता को भी  बल मिलता है|
 अगर दूसरी तरफ से समझें तो भारत का प्रत्येक नागरिक केवल भारत का नागरिक है ना की किसी प्रांत का जिसमें वह रहता है| अर्थात भारत के किसी भी प्रांत का नागरिक भारत का ही नागरिक होता है|

  •  वयस्क मताधिकार- 

भारत में संसदीय शासन प्रणाली की व्यवस्था है| जिसमें देश का प्रशासन जनता को प्रतिनिधियों के निर्वाचन का अधिकार देता है | अतः संविधान प्रत्येक वयस्क नागरिक को मत देने का अधिकार भी प्रदान करता है |क्योंकि संविधान के लागू होने के समय से ही  वयस्कों को 21 वर्ष की आयु पूरा करने के बाद मत देने का अधिकार प्राप्त था | परंतु 61 वें संविधान संशोधन (1989) में इस आयु सीमा को घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया|
अब हमारे देश के युवा 18 वर्ष पूरा करते ही अपना नेता चुनने के अधिकारी हो गए हैं|

  •  केंद्र उन्मुख संविधान-

यहां भारतीय संविधान की एक महत्वपूर्ण व्यवस्था है| कि संघात्मक होते हुए भी इसमें केंद्रीकरण की प्रबल प्रवित्ति है| आपातकालीन परिस्थितियों में संविधान पूर्णता  एकात्मक स्वरूप धारण कर लेता है|

  •  पंथनिरपेक्ष राज्य-


1 -भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है| इसलिए संविधान किसी भी धर्म विशेष को भारत राष्ट्र के धर्म के तौर पर मान्यता नहीं देता है|
2- भारतीय संविधान में सभी नागरिकों को धर्म, विश्वास, और उपासना की स्वतंत्रता दी गई है| किंतु अन्य संस्थाओं की तरह धार्मिक स्वतंत्रता पर भी सार्वजनिक व्यवस्था सदाचार और स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए युक्तियुक्त रोक लगाई जा सकती|
हमारे संविधान की यही सुंदरता है| मित्रों वह यह है |कि भारत के सभी धर्मों के आदर के साथ धर्मनिरपेक्षता के सकारात्मक पहलुओं को शामिल किया गया है|
 

  • समाजवादी राज्य- 


समाजवादी राज्य की स्थापना संविधान का मुख्य उद्देश्य है| जिस के संकेत प्रस्तावना में वर्णित सभी नागरिकों को आर्थिक न्याय प्रतिष्ठा तथा अवसर की समानता दिलाने के संकल्प में मिलता है|
समाजवादी शब्द संविधान में 42वां संशोधन द्वारा वर्ष 1976 में जोड़ा गया| मित्रों समाजवाद लोकतांत्रिक विचारधारा पर आधारित है| जिसका उद्देश्य विभिन्न वर्गों में असमानता समाप्त करके आर्थिक एवं सामाजिक शोषण को समाप्त करना है|


  • कर्तव्य मूल - 

मित्रो संविधान में नागरिकों को अधिकार तो प्रदान किए गए थे| मगर कर्तव्य का वर्णन नहीं किया गया था|  भारत के नागरिकों के अपने राष्ट्र के प्रति कुछ कर्तव्य भी होने अनिवार्य थे अतः 42 वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में एक नया भाग 4 (क) एवं अनुच्छेद 51 (क) जोड़कर नागरिकों के मूल कर्तव्य को शामिल कर लिया गया|

  •  अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा-


 भारतीय संविधान इस अर्थ में भी विशिष्ट है| कि इसमें अल्पसंख्यक समुदाय के हितों को सुरक्षा प्रदान की गई है| इसके लिए मूल अधिकारों की सूची में धार्मिक स्वतंत्रता सांस्कृतिक तथा शिक्षा संबंधी अधिकार दिए गए हैं|

  •  विधि का शासन- 


विधि के शासन से तात्पर्य है| मित्रों संसद द्वारा बनाए गए नियमों का पालन होना |इसी क्रम में भारतीय संविधान विधि के शासन की स्थापना करता है | इसके अंतर्गत विधि के समक्ष सभी नागरिक समान हैं |
तथा राज्य के सभी अंग एवं प्राधिकारी विधि द्वारा नियमित एवं नियंत्रित है|

  • अनेक देशों के संविधानिक तत्वों का समावेश-


भारतीय संविधान की विशेषता का एक यह भी कारण है| जिसमें विभिन्न देशों के संविधान में निहित महत्वपूर्ण तत्वों का समावेश किया गया है| विदेशी संविधानो  के अनुबंधों को भारतीय वातावरण के अनुसार ढाल कर संविधान में शामिल किया गया है|

  •  त्रिस्तरीय शासन /विकेंद्रीकृत  व्यवस्था-


 शासन संचालन में सुगमता व पारदर्शिता हेतु 73 वे  एवं 74 वें संविधान संशोधन के माध्यम से स्थानीय स्वशासन का उपबंध किया गया है| इस प्रकार केंद्र राज्य एवं स्थानीय स्तर पर त्रि स्तरीय शासन व्यवस्था का उपबंध किया गया है |जो विश्व के अन्य संविधान में नहीं
 है |

उम्मीद है आपको पसंद आया होगा कोई समस्या हो तो आप कमेंट बॉक्स में पूछ सकते है |

घरेलु हिंसा के लिए प्रार्थना पत्र

दहेज़ व् घरेलु हिंसा के खिलाफ थाने में प्रार्थना पत्र

 शेवा में ,             

             श्री मान थाना अध्यक्ष 

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विषय - घरेलू हिंसा की संदर्भ में |

महोदय जी , मै -----------------पिता /पति ----------------पता -----------------------------------------------------|

मेरी शादी लगभग 1 वर्ष पहले ----------------------पिता ----------------------पता ---------------------------------

से हुयी थी  | जिसमे मेरे ससुराल पक्ष ने हमारे पिता जी से  काफी सारे गहने और घरेलु सामान जैसे बर्तन इत्यादि लिए| और साथ ही मेरे पिता जी से नगद  ----------रूपये भी लिए | हमारी शादी तारीख ---------को  सम्पन्न हुयी | और हम अपने मायके से  विदा होकर ससुराल आ गए | महोदय जी बताना चाहूंगी की कुछ दिन तक सब कुछ ठीक  रहा |लेकिन कुछ ही दिन बाद मुझसे फिर से अपने पिता जी से पैसे मागने और मंगाने  के लिए मेरे पति व् मेरी सास के  द्वारा बोला जाने लगा | जब मैंने कहा की शादी के समय जो देना था मेरे पिता जी ने दे दिया है | अब उनके पास पैसे नहीं हैं | और अब मै उनसे कुछ भी नहीं मांगूंगी | तो उन लोगो का ब्यवहार मेरे प्रति एकाएक  बदल गया | और उन लोगो ने मुझे परेशान करना शुरू कर दिया| मुझे अपने मायके से सम्पर्क रखने से मना कर दिया गया |और  बोला गया की अब अपने मायके बालो को भूल जाओ जब वो लोग तुम्हे पैसे नही दे सकते तो उनसे सम्पर्क रखने की आवश्यकता नही है | महोदय जी इस तरह की बात सुन कर जब हमने विरोध करने का प्रयास किया| तो मेरे पति व उनके घर वालो ने मुझे मारा| और  फिर बात बात पर मुझे मरना पीटना उन लोगो की आदत बन गयी| उन लोगो का कहना है |अपने पिता से पैसे  लाओ नहीं तो यहाँ  से अपने पिता के घर हमेशा के लिए चली जाओ | महोदय जी हम ये सब सहते रहे लेकिन हद तो तब हो गयी जब मुझे डंडे से मार मार कर अधमरा कर दिया  गया | तब मैंने हिम्मत करके अपने मायके बालो कोफोन कर  बुलाया | और वो लोग मुझे उस  दलदल से निकाल कर अपने साथ मेरे पिता जी घर ले आये | यहाँ आने के बाद मैंने अपने साथ हुए अन्याय का विरोध करने की हिम्मत जुटा  पाई | और कानून का सहारा लेने का मन बनाया   |

अतः महोदय  जी प्रार्थना करती हूँ की मेरे साथ  हुए अमानवीय कृत्य के लिए दोषी मेरे पति व् उनके घर बालो पर कठोर क़ानूनी कार्यवाही करने की कृपा करे आपकी बहोत आभारी रहूंगी | धन्यवाद 


दिनंक --                                                                                                                           प्रार्थनी 




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