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मंगलवार, 1 सितंबर 2020

न्यायालय की अवमानना के दोषी सिद्ध हुए प्रशान्त भूषण हुवा एक रुपया का जुर्माना | जाने क्या है न्यायालय की अवमानना ? आपको भी ध्यान रखना होगा क्योकि न्यायालय की अवमानना आपसे भी अनजाने में हो सकती है

न्यायालय की अवमानना के दोषी शिद्ध हुए प्रशान्त भूषण हुवा एक रुपया का जुर्माना 

तो समझिये क्या होती है न्यायालय की अवमानना 

न्यायालय की अवमानना:

  • न्यायालय का अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Court Act, 1971) के अनुसार, न्यायालय की अवमानना का अर्थ किसी न्यायालय की गरिमा तथा उसके अधिकारों के प्रति अनादर प्रदर्शित करना है।
  • इस अधिनियम में अवमानना को ‘सिविल’ और ‘आपराधिक’ अवमानना में बाँटा गया है।
    • सिविल अवमानना: न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री, आदेश, रिट, अथवा अन्य किसी प्रक्रिया की जान बूझकर की गई अवज्ञा या उल्लंघन करना न्यायालय की सिविल अवमानना कहलाता है।
    • आपराधिक अवमानना: न्यायालय की आपराधिक अवमानना का अर्थ न्यायालय से जुड़ी किसी ऐसी बात के प्रकाशन से है, जो लिखित, मौखिक, चिह्नित , चित्रित या किसी अन्य तरीके से न्यायालय की अवमानना करती हो।
  • हालाँकि किसी मामले का निर्दोष प्रकाशन, न्यायिक कृत्यों की निष्पक्ष और उचित आलोचना तथा न्यायालय के प्रशासनिक पक्ष पर टिप्पणी करना न्यायालय की अवमानना के अंतर्गत नहीं आता है।

न्यायालय की अवमानना के लिये दंड का प्रावधान:

  • सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय को अदालत की अवमानना के लिये दंडित करने की शक्ति प्राप्त है। यह दंड छह महीने का साधारण कारावास या 2000 रूपए तक का जुर्माना या दोंनों एक साथ हो सकता है।
  • वर्ष 1991 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला सुनाया कि उसके पास न केवल खुद की बल्कि पूरे देश में उच्च न्यायालयों, अधीनस्थ न्यायालयों तथा न्यायाधिकरणों की अवमानना के मामले में भी दंडित करने की शक्ति है।
  • उच्च न्यायालयों को न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 10 के अंतर्गत अधीनस्थ न्यायालयों की अवमानना के लिये दंडित करने का विशेष अधिकार प्रदान किया गया है।

अवमानना अधिनियम की आवश्यकता:

  • न्यायालय का अवमानना अधिनियम, 1971 का उद्देश्य न्यायालय की गरिमा और महत्त्व को बनाए रखना है।
  • अवमानना से जुड़ी हुई शक्तियाँ न्यायाधीशों को भय, पक्षपात और की भावना के बिना कर्त्तव्यों का निर्वहन करने में सहायता करती हैं।

संवैधानिक पृष्ठभूमि:

  • अनुच्छेद 129: सर्वोच्च न्यायालय को स्वंय की अवमानना के लिये दंडित करने की शक्ति देता है।
  • अनुच्छेद 142 (2): यह अनुच्छेद अवमानना के आरोप में किसी भी व्यक्ति की जाँच तथा उसे दंडित करने के लिये सर्वोच्च न्यायालय को सक्षम बनाता है।
  • अनुच्छेद 215: उच्च न्यायालयों को स्वंय की अवमानना के लिये दंडित करने में सक्षम बनाता है
आपको भी ध्यान रखना होगा क्योकि न्यायालय की अवमानना आपसे भी अनजाने में हो सकती है | 
https://mickyvakeel.com/page/2/इन्हें भी जानें

रविवार, 30 अगस्त 2020

धार्मिक भावनाओं को आहत करना गंभीर अपराध है ! जाने IPC की धारा 295 (A) के बारे में

  • धार्मिक भावनाओ को आहत करना =


तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए|  हमें भी इस धारा के बारे में गहन अध्ययन, और अपने लोगों तक इस अध्ययन को पहुंचाने और इसके बारे में जनसाधारण को जानकारी कराने की  इच्छा जागृत हुई| लगातार हो रही  ऐसी घटना  जिसमें धर्मों के खिलाफ बोलना लोगों का फैशन बन गया है| और यह वही लोग हैं |जो कभी धर्म की उन्नति के लिए या समाज की उन्नति के लिए कुछ कर नहीं सकते| और सदैव धर्म का नाम लेकर उल्टी-सीधी बकवास करते हुए दिखाई पड़ जाते हैं| जनसाधारण को यह जान लेना बहुत आवश्यक है| की धार्मिक भावनाओं को आहत करना कानून अपराध है | जिसकी व्याख्या भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 295 (A) में की किया गया  है| और कई ऐसे माननीय उच्च न्यायालय और माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश हैं| जिसके माध्यम से इन धाराओं को वैध करार दिया गया है| और ऐसे कृत्या को अपराध की श्रेणी  में रक्खा गया है |

  • आइए सबसे पहले जानते हैं कि क्या कहती है भारतीय दंड संहिता की धारा 295 (A)-


भारतीय दंड संहिता 1860  की धारा 295(A)  के अंतर्गत वह कृत्य अपराध माने जाते हैं| जहां कोई आरोपी व्यक्ति भारत के नागरिकों के किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के विचार से ,और विद्वेषपूर्ण  आशा से उस वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करता है| या ऐसा करने का प्रयत्न करता है |तो  वह इस धारा के अंतर्गत दंडनीय होगा |

दूसरे शब्दों में अगर कहा जाए तो |


धारा 295 (A)  कहती है , कि विमर्शित और विद्वेष पूर्ण कार्य जो किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करने  | उसकी धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आशय से किए गए हो | जो कोई भारत के नागरिकों के किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के विमर्शित  और विद्वेषपूर्ण आशय  से उस वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान उच्चारित ,या लिखित शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्य रूपों द्वारा या अन्यथा करेगा|
 या करने का प्रयत्न करेगा | वह दोनों में से किसी भांति के कारावास जिसकी अवधि 3 वर्ष तक की हो सकेगी | 
या जुर्माने से या दोनों से दंडित किया जाएगा |

  • इस धारा पर उठ चुके है सवाल-


भारतीय दंड संहिता 1960 की धारा 295 (A) की संवैधानिकता पर सवाल भी खड़े किए जा चुके हैं |
बता दूँ 
 रामजीलाल मोदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य ए आई आर 1957 एस सी 620 के मामले में लगा था |
और उच्चतम न्यायालय द्वारा यहां आदेशित  किया गया था | कि यह धारा संविधान के विरुद्ध नहीं है |
दरअसल इस मामले में याचिकाकर्ता एक मासिक पत्रिका "गौ रक्षक" का संपादक /प्रकाशक था| 
जिसे भारतीय दंड संहिता 1860  की धारा 295 (A) के तहत अपनी पत्रिका में छपे एक लेख के चलते अदालत द्वारा दोषी ठहराया गया था | 
दोष  सिद्धि के बाद उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपील की इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सेशन न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा |
इसके बाद याचिकाकर्ता उच्चतम न्यायालय पहुंचा | उसकी यह दलील थी | कि यह धारा संविधान के अनुच्छेद 19(1)A   के अंतर्गत गारंटी किए गए मूल अधिकार 'वाक  स्वातन्त्र्य'  के खिलाफ है | अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा था |
 कि यह धारा केवल धर्म के अपमान के गंभीर रूप को दण्डित  करती है | जब वह अपमान किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के  और विद्वेषपूर्ण   किया जाता है | 
अपमान के इस उग्र रूप की प्रविष्टि स्पष्ट रूप से लोक व्यवस्था को बाधित करना होती है | 
और यह धारा इस तरह की गतिविधियों को दंडित करती है | 
इसलिए इस धारा को संविधान के अनुच्छेद 19 (2 ) का संरक्षण अच्छी तरह से प्राप्त है | जो कि अनुच्छेद 19 (1)(A ) द्वारा गारंटी कृत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के अभ्यास पर उचित प्रतिबंध लगाने वाले कानून को संरक्षण देता है |

मतलब मित्रों 

माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी इस धारा को सही ठहराते हुए इस धारा को वैध माना था जिसको संविधान का भी बल प्राप्त है

मित्रों लगातार देखा जा रहा है | कि धर्म के खिलाफ बोलना लोगों का फितूर बनता जा रहा है | और उनको दो अक्षर पढ़ने के बाद ऐसा लगता है |जैसे पूरा ब्रह्मांड उन्हीं के ज्ञान  में समाहित हो गया है | और आपके सामने ऐसे ऐसे तर्क प्रस्तुत करते हैं | लोग जिसका कोई सिर पैर नहीं होता | ऐसे लोगों को भी यह जान लेना चाहिए | कि किसी भी धर्म का अपमान करना ना केवल सामाजिक अपितु कानून भी अपराध की श्रेणी में आता है |और जनसाधारण को भी इस धारा के बारे में जानकारी होनी आवश्यक है | जिससे किसी भी धर्म का किसी भी अराजक तत्वों द्वारा अपमान ना किया जा सके | जबकि संवैधानिक संरक्षण धर्म के सम्मान के लिए प्राप्त है
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mickyvakeel.com

शनिवार, 29 अगस्त 2020

क्रास केस क्या है ? क्रास केस की शिकायत कैसे करें? अगर पुलिस क्रास केस न करें तो कोर्ट द्वारा कैसे किया जाए?

  • क्रॉस केस क्या है?-- 
जब दो पक्ष एक दूसरे पर एफ आई आर रजिस्टर्ड करवाते हैं| ऐसे केसों को क्रास केस कहा जाता है| 
विस्तार से समझने के लिए अगर अमित ने एक एफ आई आर सोहन के खिलाफ दर्ज करवाई है| और बाद में सोहन उसी प्रकरण का f.i.r. अमित के खिलाफ दर्ज करा दे तो ऐसे मामलों को क्रास केस कहा जाता है|

  • क्रास केस की शिकायत कैसे करें  ? 

पुलिस थाने के अंदर आपके एप्लीकेशन पर ही क्रास केस दर्ज कर दे तो अच्छा है| नहीं तो पुलिस ज्यादातर मामलों में टालमटोल कर देती है| ऐसे में हमें यह जानकारी होना बहुत जरूरी है| कि आगे के क्या  रास्ते होते हैं |तो आइए जानते हैं| सबसे पहले हमें अगर संभव हो तो 112 नंबर पर कॉल करनी चाहिए| और उसके बाद इंस्पेक्टर से ऊपर किसी भी अधिकारी के पास शिकायत दर्ज करानी चाहिए  अगर इंस्वपेक्हांटर नहीं सुन रहा तो | शिकायत ऑनलाइन ऑफलाइन हो सकती है |और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है की  हमें  अपना मेडिकल करवा लेना चाहिए ताकि भविष्य में अगर जरूरत पड़े तो कोर्ट से क्रास केस  कराया जा सके|

मित्रों मेडिकल की बात करें तो यह एक महत्वपूर्ण कड़ी है |इस लिए इस्पे विशेष बात करते हैं | अगर पुलिस आपका मेडिकल नहीं करा रही है| तो आप पुलिस के सीनियर ऑफिसर से शिकायत करके अपना मेडिकल करवा सकते हैं| अगर सीनियर ऑफिसर भी आपकी बात नहीं सुनते हैं| और अगले पक्ष का मेडिकल करवा लिया जाता है| और आपका   मेडिकल नहीं कराया जाता है | तो आप अपना प्राइवेट मेडिकल करवा सकते हैं|

मेडिकल कराना मित्रों बहुत जरूरी है क्योंकि कोट सबूतों के आधार पर ही सजा सुनाती है तो अगर आप को गंभीर चोटें नाभि आई हो तब भी आप अपना  मेडिकल करवा सकते हैं| अगर आपका स्कीन लाल भी हो या सुजन हो तब भी आपका मेडिकल हो सकता है |
  • अगर पोलिष क्रास केस न करें तो  कोर्ट द्वारा  क्रास केस कैसे किया जाए ?

अगर आपकी पुलिस नहीं सुने, और सीनियर अधिकारी भी आपकी बात नहीं सुन रहे हैं| तो आप कोर्ट में जाकर धारा 156 (3) सीआरपीसी के तहत  कोर्ट के माध्यम से केस दर्ज करा सकते हैं |अगर आप शिकायत में अपनी बात कहते हैं और मेडिकल रिपोर्ट भी लगाते हैं |तो अगर कोर्ट को लगे कि आपकी बात और तथ्यों में सच्चाई है |तो वह संबंधित पुलिस थाने को एफ आई आर दर्ज करने का आदेश दे सकती है|

  • क्रास केस करने की समय सीमा क्या है ?-

वैसे तो क्रिमिनल केस करने की कोई समय सीमा नहीं होती है| लेकिन फिर भी जब सामने वाले की ऍफ़  आई आर दर्ज हो गई हो| तो बिना देरी किए अपनी एफ आई आर दर्ज करा लेनी चाहिए| 
और इस तथ्य को नहीं भूलना चाहिए की देरी  करना नुकसानदेह होता है|

न्यायालय की अवमानना के दोषी सिद्ध हुए प्रशान्त भूषण हुवा एक रुपया का जुर्माना | जाने क्या है न्यायालय की अवमानना ? आपको भी ध्यान रखना होगा क्योकि न्यायालय की अवमानना आपसे भी अनजाने में हो सकती है

न्यायालय की अवमानना के दोषी शिद्ध हुए प्रशान्त भूषण हुवा एक रुपया का जुर्माना  तो समझिये क्या होती है न्यायालय की अवमानना  न्यायालय की अवमान...