शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

IPC की धारा 1 , धारा 2, धारा 3,

IPC की धारा 

आईपीसी के बारे में बात करते हुए | आज आईपीसी की प्रथम धारा का वर्णन करना आवश्यक हो गया है |जो अनावश्यक ही छुट  जाती है| और ना ही हम कभी इन छोटी धाराओं का जिक्र ही करते हैं | लेकिन अगर सोचा जाए| तो इस ग्रंथ रूपी किताब की यह छोटी धाराएं आधारशिला हैं जो | मुख्य रूप से इस संहिता की  अवधारणा को व्यक्त करती है | इनको समझना सभी के लिए आवश्यक है | परन्तु   हम उन सभी धाराओं को समझ लेते हैं| जो हमारे समाज में दंडात्मक  और  गंभीर मानी जाती है| और हम इन आधारभूत धाराओं को विस्मृत कर देते हैं| जबकि इन सभी धाराओं क  ज्ञान ही हमें  पूर्ण बनाता है | तो फिर आइए अब क्रमशः  इन धाराओं की चर्चा कर लेते हैं |

आईपीसी की प्रथम धारा से इस ग्रंथ की शुरुआत होती है |जो इस प्रकार है| 


  •  IPC की धारा .1-
 यह अधिनियम भारतीय दंड संहिता कहलाएगा |और इसका विस्तार संपूर्ण भारत में होगा|
 बता दूं कि धारा 370 हटने के बाद आईपीसी की सभी धाराएं जम्मू कश्मीर राज्य में भी लागू होने लगी हैं|
अतः इस धारा में  संहिता  का नाम और   प्रवर्तन के विस्तार बताए गए हैं|

  • IPC  धारा . 2-
ब्यक्तिक क्षेत्राधिकार- जहां किसी व्यक्ति द्वारा भारतीय सीमा के अंदर कोई अपराध किया जाता है| चाहे वह भारतीय नागरिक हो या विदेशी संहिता  वहां पर लागू होगी | क्योंकि जो व्यक्ति अपराध कारित  करता है| वह अपराध के प्रभाव को भारत की धरती पर उत्पन्न करता है | संहिता की धारा २  ऐसे मामलों से ही संबंधित है|
 हम कह सकते हैं कि व्यक्ति भारत के अंदर अपराध कार्य करेगा| चाहे वह किसी भी प्रांत का किसी भी देश का हो उसके ऊपर आईपीसी की धारा प्रभावी होगी|

  • IPC धारा .3- 

संहिता की धारा 3  बहू प्रदेशिक क्षेत्राधिकार से संबंधित है| भारतीय आपराधिक न्यायालय का क्षेत्राधिकार इसके नागरिकों पर भारत के भीतर तथा इसके बाहर भी है| साधारण रूप में किसी देश के न्यायालय को केवल अंतः प्रादेशिक क्षेत्राधिकार होता है| तथा इसकी विधियां उसकी सीमा के भीतर ही प्रवर्तित हो सकती हैं| क्योंकि कोई अपनी सीमा से दूसरे राज्य को अपना अधिकार लागू करने की सहमति नहीं दे सकता | परंतु अपवाद परिस्थितियों में वही प्रदेशिक प्रभाव रखने वाली विधियों को अधिनियमित किया जाता है |भारतीय संविधान के अनुच्छेद  245(2) निर्धारित करती है, कि संसद द्वारा निर्मित कोई भी कानून वही प्रदेश क्षेत्र अधिकार होने के कारण अवैधानिक नहीं समझा जाएगा| यह अनुच्छेद निर्धारित करता है ,कि यदि कोई कृत्य भारत में अपराध है और वही कृत्य भारत की सीमा से परे यदि घटित होता है | तो भी वह अपराध होगा|  धारा 3 में प्रयुक्त भारतीय विधि द्वारा शब्द का प्रयोग | इस धारा के प्रवर्तन को प्रत्यर्पण अधिनियम 1962 ,तथा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 187  और 188 में वर्णित मामलों तक ही सीमित रखता है| अपराध किसी भी व्यक्ति ,जो आरोपित अपराध को करते समय भारतीय न्यायालयों के क्षेत्राधिकार में था |  द्वारा किया  जा सकता है| ऐसा व्यक्ति भारतीय नागरिक हो भी सकता है| और नहीं भी यदि कोई भारती किसी दूसरे देश में एक कार्य करता है |और वह कार्य उस देश की विधि के अनुसार अपराध नहीं है| किंतु भारतीय विधि के अनुसार अपराध है| तो उसे भारत में अभियोजन(मुकदमा) का सामना करना पड़ेगा|

आइए इसको उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं-

रवि एक भारतीय लड़का है उसने एक विदेशी  डेविड को कुछ काम करने के लिए ₹10000 का चेक प्रदान किया  है| डेविड रवि को धोखा देकर अपने देश चला जाता है| तो रवि इस मामले को न्यायालय में अभियोजन कर सकता है चाहे वह व्यक्ति भारत में या भारत के परे का व्यक्ति ह


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